- October 7, 2026
Explained: ‘किंगमेकर’ की भूमिका में 52 लाख भारतीय-अमेरिकी मतदाता, क्या ट्रंप को देंगे झटका
अमरीका में 3 नवंबर, 2026 को होने वाले मध्यावधि चुनावों से पहले सबसे अधिक चर्चा है भारतीय अमेरिकी वोटर्स की. क्या इस बार भारतीय वोटर्स ट्रंप की पार्टी को झटका देंगे? हाल के वर्षों में ट्रंप सरकार ने कई ऐसे फैसले लिए हैं जिससे भारतीयों को अमेरिका में काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ा है ऐसे में ये सवाल वाजिब हो जाता है.
मध्यावधि चुनावों को लेकर राजनीतिक दलों का प्रचार अभियान अपने चरम पर है. इस बार अमरीकी संसद के दोनों सदनों सीनेट और हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स पर नियंत्रण हासिल करने के लिए रिपब्लिकन और डेमोक्रेटिक पार्टी के बीच ऐतिहासिक और बेहद कड़ा मुकाबला देखने को मिल रहा है. प्रमुख चुनावी राज्यों में राष्ट्रीय सर्वे यही इशारा कर रहे हैं कि जीत-हार का अंतर बेहद मामूली रहने वाला है. ऐसे में दोनों पार्टियां एक ऐसे विशेष मतदाता वर्ग को साधने में पूरी ताकत लगा रही हैं जो तेज़ी से बढ़ रहा है, अत्यधिक शिक्षित है और आर्थिक रूप से बेहद संपन्न है. यह वर्ग भारतीय-अमेरिकी मतदाताओं की है.
कभी केवल पारंपरिक ‘ब्लू स्टेट्स’ (डेमोक्रेटिक गढ़ों) तक सीमित समझा जाने वाला यह समुदाय आज अमरीकी राजनीति में सबसे बड़ा राजनीतिक ‘स्विंग’ फैक्टर बन चुका है. स्विंग राज्यों में इनकी बढ़ती आबादी और मजबूत मतदान भागीदारी ने इन्हें 2026 के मध्यावधि चुनावों में ‘किंगमेकर’ की भूमिका में ला खड़ा किया है.
अमरीका में भारतीय-अमेरिकी समुदाय
यूनाइटेड स्टेट्स सेंसस ब्यूरो के नवीनतम आंकड़ों और AAPI (एशियन अमेरिकन और पैसिफिक आइलैंडर) डेटा के अनुसार, अमरीका में भारतीय मूल के लोगों की आबादी में पिछले डेढ़ दशक में काफी बढ़ी है.
वर्ष 2010 में अमरीका में भारतीय मूल की आबादी लगभग 28 लाख (2.8 मिलियन) थी, जो 2026 तक बढ़कर 52 लाख (5.2 मिलियन) से अधिक हो चुकी है. यानी एक दशक से थोड़े अधिक समय में इसमें 50 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि दर्ज की गई है, जिससे यह अमरीका में सबसे तेज़ी से बढ़ने वाला एशियाई-अमेरिकी समूह बन गया है.
इस 52 लाख की कुल आबादी में से 21 लाख से अधिक योग्य वयस्क अमरीकी नागरिक हैं, जो मतदान करने के पात्र हैं. जॉर्जिया, पेंसिल्वेनिया, नॉर्थ कैरोलिना, टेक्सास, मिशिगन और एरिज़ोना जैसे चुनावी रूप से बेहद संवेदनशील राज्यों के उपनगरीय इलाकों में इस समुदाय का घनत्व काफी अधिक है. इन राज्यों में जीत-हार का अंतर कुछ हजार वोटों का ही होता है, जहां 21 लाख भारतीय-अमेरिकी मतदाता परिणाम पलटने की क्षमता रखते हैं.
उच्च मतदान दर और आर्थिक-शैक्षणिक ताकत
राजनीतिक अभियानों के दृष्टिकोण से भारतीय-अमेरिकी समुदाय की सबसे बड़ी खासियत इनकी चुनावी प्रक्रिया में अत्यधिक सक्रिय भागीदारी है. ऐतिहासिक रूप से अन्य अल्पसंख्यक समूहों में मतदान का प्रतिशत कम देखा गया है, लेकिन भारतीय-अमेरिकियों ने 2020 के अमरीकी राष्ट्रपति चुनाव में रिकॉर्ड 71 प्रतिशत मतदान दर्ज किया था. 2024 के चुनावों में भी यह दर 70 प्रतिशत के मजबूत स्तर पर बनी रही.
APIAVote और AAPI डेटा के 2026 वोटर सर्वे के अनुसार, पंजीकृत भारतीय-अमेरिकी मतदाताओं में से 90 प्रतिशत ने चुनाव में वोट देने का मन बनाया है, जिनमें से 71 प्रतिशत ने कहा है कि वे ‘निश्चित रूप से’ मतदान करेंगे.
75 प्रतिशत से अधिक भारतीय-अमेरिकी वयस्कों के पास बैचलर या उससे उच्च शैक्षणिक डिग्री है. इस वजह से यह समुदाय नीतिगत बहसों को गहराई से समझता है, आर्थिक स्थिरता पर ध्यान देता है और अमरीकी राजनीति में सबसे प्रमुख वित्तीय योगदानकर्ताओं में शामिल है.
राजनीतिक झुकाव और विचारधारात्मक बदलाव
ऐतिहासिक रूप से भारतीय-अमेरिकी गैर-श्वेत नागरिक समूहों में डेमोक्रेटिक पार्टी के सबसे वफादार समर्थक रहे हैं. 2026 के सीनेट रेस से जुड़े सर्वे बताते हैं कि 66 प्रतिशत भारतीय-अमेरिकी उत्तरदाता डेमोक्रेटिक उम्मीदवार पसंद करते हैं, जबकि केवल 22 प्रतिशत का झुकाव रिपब्लिकन पार्टी की ओर है.
डेमोक्रेटिक पार्टी की ओर झुकाव के मुख्य कारण:
-सामाजिक विविधता, नागरिक अधिकारों के ढांचे और समावेशिता का समर्थन
-स्वास्थ्य सेवा, वैज्ञानिक अनुसंधान और पर्यावरण संरक्षण में सार्वजनिक निवेश का समर्थन
-दक्षिणपंथी सामाजिक रूढ़िवादिता और पारंपरिक ईसाई राष्ट्रवाद के प्रति सतर्कता व संदेह
कार्नेगी एंडोमेंट फॉर इंटरनेशनल पीस की रिपोर्ट के अनुसार, 2020 के बाद से खुद को पूरी तरह से ‘डेमोक्रेट’ मानने वाले भारतीय-अमेरिकियों की संख्या 55% से घटकर 46% पर आई है. हालांकि, यह वोट बैंक सीधे रिपब्लिकन पार्टी में जाने के बजाय ‘इंडिपेंडेंट’ श्रेणी में स्थानांतरित हुआ है, जो 2024 में 25% से बढ़कर 2026 में 29% तक पहुंच गया है.
2026 चुनावों में डोनाल्ड ट्रंप से दूरी बना सकते हैं भारतीय?
यदि 2026 के इन अहम मध्यावधि चुनावों में भारतीय-अमेरिकी मतदाता डोनाल्ड ट्रंप और रिपब्लिकन पार्टी से दूरी बनाते हैं, तो इसके पीछे 5 प्रमुख नीतियां और कारण जिम्मेदार हैं.
-भारतीय-अमेरिकी समुदाय कानूनी आव्रजन, H-1B वर्क वीजा और ग्रीन कार्ड बैकलॉग से सीधा सरोकार रखता है. ट्रंप की “अमेरिका फर्स्ट” और वीजा नियमों में सख्ती (फीस वृद्धि और न्यूनतम वेतन की शर्तें) से भारतीय आईटी पेशेवरों, छात्रों और उनके परिवारों में भारी असंतोष रहता है.
– अल्पसंख्यक पहचान के कारण यह समुदाय अमरीका में बहुसांस्कृतिक समाज का समर्थक है. ट्रंप की आक्रामक बयानबाजी और उग्र राष्ट्रवाद के कारण एशियाई-अमेरिकियों के खिलाफ बढ़ते ‘हेट क्राइम’ और भेदभाव से यह वर्ग असहज महसूस करता है.
-एक समृद्ध और शिक्षित समुदाय होने के नाते ये मतदाता सरकारी वित्तपोषित सार्वजनिक शिक्षा, वैज्ञानिक शोध और अफोर्डेबल केयर एक्ट का समर्थन करते हैं, जबकि ट्रंप प्रशासन में इनमें कटौती का प्रयास किया जाता रहा है.
-पर्यावरण संतुलन और स्वच्छ ऊर्जा को लेकर भारतीय-अमेरिकी काफी सजग हैं. पेरिस जलवायु समझौते से बाहर निकलने जैसे ट्रंप के फैसलों को यह वैज्ञानिक और दूरदर्शी सोच के विपरीत मानता है.
-डेमोक्रेटिक पार्टी ने कमला हैरिस, रो खन्ना, प्रमिला जयपाल और राजा कृष्णमूर्ति जैसे कई भारतीय-अमेरिकी चेहरों को प्रशासनिक और राजनीतिक नेतृत्व का मौका दिया है.
भले ही पीएम मोदी और ट्रंप के बीच अच्छे रिश्ते रहे हों, लेकिन यह मतदाता वर्ग अंतरराष्ट्रीय संबंधों से ऊपर उठकर अपने घरेलू नागरिक अधिकारों और आर्थिक सुरक्षा को प्राथमिकता देकर वोट देता है.