• August 12, 2026

US डॉलर का दबदबा खात्मे की कगार पर! भारत को क्या फायदा होगा?

US डॉलर का दबदबा खात्मे की कगार पर! भारत को क्या फायदा होगा?
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इन दिनों वैश्विक वित्तीय बाजारों में एक सवाल खूब गूंज रहा है कि क्या अमेरिकी डॉलर की दुनिया पर चलने वाली बादशाहत अब खत्म होने वाली है. हाल के महीनों में डॉलर में आई तेज गिरावट, दुनिया भर के केंद्रीय बैंकों के बदलते रुख और भू-राजनीतिक उठा-पटक ने इस बहस को हवा दे दी है. जनवरी 2026 से अगस्त 2026 के बीच डॉलर करीब 10% गिर चुका है. डॉलर इंडेक्स (DXY) 95.44 के उस स्तर पर पहुंच गया, जो पिछले चार साल में सबसे कम है. यह गिरावट किसी एक वजह से नहीं, बल्कि कई बड़े झटकों के एक साथ आने से हुई है. तो क्या यह डॉलर के ‘पतन’ की शुरुआत है या सिर्फ एक अस्थायी उतार-चढ़ाव…

आखिर अचानक यह बात क्यों उठी?

इस सवाल के पीछे 6 बड़ी वजहें हैं जो पिछले कुछ महीनों में एक साथ सामने आई हैं:

  • डॉलर में रिकॉर्ड गिरावट: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दूसरे कार्यकाल की शुरुआत के बाद से डॉलर व्यापक-आधारित (trade-weighted) आधार पर करीब 10% गिर चुका है. डॉलर इंडेक्स (DXY) जनवरी 2026 में 95.44 के अपने निचले स्तर पर आ गया था और अगस्त 2026 तक यह 100 के नीचे ही बना हुआ है. यह चार साल में सबसे बड़ी गिरावट है.
  • केंद्रीय बैंकों का रुख बदला: ऑफिशियल मॉनिटरी एंड फाइनेंशियल इंस्टीट्यूशंस फोरम (OMFIF) के एक सर्वे में दुनिया भर के 74 केंद्रीय बैंकों ने हिस्सा लिया. यह पहली बार है जब इस सर्वे में डॉलर होल्डिंग्स घटाने की योजना बनाने वाले केंद्रीय बैंकों की संख्या, बढ़ाने की योजना बनाने वालों से ज्यादा निकली है. यानी दुनिया के बड़े बैंक अब डॉलर से दूरी बनाने की सोच रहे हैं.
  • पेट्रोडॉलर सिस्टम में दरार: दशकों पुरानी पेट्रोडॉलर व्यवस्था के तहत सऊदी अरब ने अपना तेल सिर्फ डॉलर में बेचने का वादा किया था, जो 2024 में खत्म हो गई. अब सऊदी अरब युआन, येन और रुपये समेत दूसरी करेंसी में तेल का कारोबार कर सकता है. यह डॉलर के लिए एक बड़ा झटका है क्योंकि दशकों से दुनिया का तेल कारोबार डॉलर में ही होता आया था.
  • अमेरिकी प्रतिबंधों का उलटा असर: 2022 में यूक्रेन पर रूस के हमले के बाद अमेरिका और उसके सहयोगियों ने रूस के करीब 300 अरब डॉलर के सेंट्रल बैंक रिजर्व फ्रीज कर दिए. इस कदम का उल्टा असर हुआ कि दुनिया भर के देशों को यह एहसास हुआ कि डॉलर में रिजर्व रखना सुरक्षित नहीं है, क्योंकि अमेरिका कभी भी उन्हें फ्रीज कर सकता है. अप्रैल 2026 में रूस ने यूरोप को तेल-गैस निर्यात में डॉलर का इस्तेमाल पूरी तरह बंद कर दिया.
  • अमेरिकी कर्ज 39 ट्रिलियन डॉलर के पार: मई 2026 में अमेरिकी संघीय कर्ज 39 ट्रिलियन डॉलर को पार कर गया. कर्ज के ब्याज भुगतान सरकारी खर्च का सबसे बड़ा हिस्सा बन गए हैं, जिससे डॉलर की ‘जोखिम-मुक्त’ छवि को झटका लगा है.
  • जेपी मॉर्गन CEO की चेतावनी: जेमी डिमन (JPMorgan Chase के CEO) ने हाल ही में कहा, ‘अगर हम 25 साल में सबसे ताकतवर सेना और सबसे मजबूत अर्थव्यवस्था नहीं रहे, तो हम रिजर्व करेंसी भी नहीं रहेंगे.’ उन्होंने चेतावनी दी कि ईरान युद्ध ने यह दिखा दिया है कि अमेरिका के पास लंबे युद्ध के लिए पर्याप्त उत्पादन क्षमता नहीं है.

अभी डॉलर का कितना दबदबा है?

डॉलर का दबदबा पहले से थोड़ा कम हो रहा है:

IMF के मुताबिक, 2026 की दूसरी तिमाही में डॉलर की हिस्सेदारी 57.79% से घटकर 56.32% हो गई. इस गिरावट का 92% हिस्सा एक्सचेंज रेट में उतार-चढ़ाव की वजह से था, न कि केंद्रीय बैंकों के जानबूझकर डॉलर बेचने की वजह से. यानी असल में केंद्रीय बैंकों ने डॉलर से पीठ नहीं फेरी है, कम से कम अभी तक तो नहीं.

Brookings Institution की रिपोर्ट के मुताबिक, रिजर्व मैनेजर (जो देशों के विदेशी मुद्रा भंडार चलाते हैं) डॉलर छोड़ने की कोई जल्दी नहीं दिखा रहे. वजह साफ है कि डॉलर का कोई ठोस विकल्प नहीं है. यूरो का हिस्सा करीब 14% पर स्थिर है और चीनी युआन का हिस्सा अब भी बहुत छोटा है.

हालांकि, सोना तेजी से आगे बढ़ रहा है. 2025 के अंत तक सोना वैश्विक रिजर्व का करीब 25% हिस्सा बन गया था. 51% केंद्रीय बैंकों ने भू-राजनीतिक जोखिम से बचाव के लिए सोने में निवेश बढ़ाने की योजना बनाई है.

अगर डॉलर गिरता है तो भारत को क्या फायदा?

एक्सपर्ट्स के मुताबिक, डॉलर के कमजोर होने के भारत फायदा भी होगा और नुकसान भी:

संभावित फायदे:

  • आयात सस्ता होगा: डॉलर गिरने पर भारत को कच्चा तेल, सोना, इलेक्ट्रॉनिक्स और मशीनरी जैसे आयात सस्ते मिलेंगे. भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल आयातक है. अगर तेल की कीमतें (डॉलर में) गिरती हैं तो भारत की आयात बिल घटेगी और महंगाई काबू में आ सकती है.
  • विदेशी कर्ज पर बोझ कम: भारत का कुछ विदेशी कर्ज डॉलर में है. डॉलर कमजोर होने पर कर्ज चुकाने का बोझ रुपये के लिहाज से कम हो जाता है.
  • विदेशी निवेश बढ़ना: कमजोर डॉलर का मतलब है कि विदेशी निवेशकों को भारतीय बाजार ज्यादा आकर्षक लगेंगे. फॉरेन पोर्टफोलियो इन्वेस्टमेंट (FPI) बढ़ सकता है, जिससे शेयर बाजार को मजबूती मिलेगी.
  • रुपये को अंतरराष्ट्रीय बनाने का मौका: डॉलर के कमजोर पड़ने से दूसरी मुद्राओं को मौका मिलता है. भारत पहले से ही रुपये में अंतरराष्ट्रीय व्यापार के लिए सिस्टम बना चुका है. कई देशों ने रुपये में व्यापार के लिए इन खातों को खोला है.
  • पर्यटन को बढ़ावा: डॉलर कमजोर होने पर विदेशी पर्यटकों को भारत आना सस्ता पड़ता है, जिससे पर्यटन उद्योग को फायदा होता है.

संभावित नुकसान:

  • निर्यात महंगा होगा: डॉलर गिरने पर भारतीय निर्यात विदेशियों के लिए महंगा हो जाता है. IT, फार्मा, टेक्सटाइल और गारमेंट्स जैसे निर्यात-प्रधान क्षेत्रों को नुकसान हो सकता है.
  • विदेशी मुद्रा भंडार का मूल्य घटेगा: भारत का विदेशी मुद्रा भंडार यानी फॉरेक्स ट्रेड बड़े हिस्से में डॉलर में है. डॉलर गिरने पर इन रिजर्व्स की रुपये में कीमत घट सकती है.
  • अस्थिरता बढ़ने का अंदेशा: डॉलर की अचानक बड़ी गिरावट से वैश्विक बाजारों में अस्थिरता आ सकती है, जिसका असर भारतीय शेयर बाजार पर भी पड़ेगा.

भारत की आगे की क्या रणनीति है?

सबसे दिलचस्प बात यह है कि भारत BRICS की डी-डॉलराइजेशन मुहिम में पूरी तरह शामिल नहीं है:

  • अगस्त 2026 में भारत ने साफ कहा कि वह BRICS की कोई साझा मुद्रा बनाने का समर्थन नहीं करता.
  • भारत ‘डी-डॉलराइजेशन एजेंडा’ नहीं चला रहा, बल्कि अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा के लिए रुपये में व्यापार के विकल्प बढ़ा रहा है.
  • भारत BRICS को अमेरिका या पश्चिमी वित्तीय ताकतों के खिलाफ कोई मोर्चा नहीं बनाना चाहता.

एक्सपर्ट्स कहते हैं कि भारत व्यावहारिक रास्ता अपना रहा है. डॉलर पर निर्भरता कम करना चाहता है, लेकिन अमेरिका से सीधा टकराव भी नहीं चाहता.

तो क्या डॉलर का दबदबा खत्म हो जाएगा?

फिलहाल तो नहीं. डॉलर अभी भी दुनिया की सबसे बड़ी रिजर्व करेंसी है और उसका कोई ठोस विकल्प मौजूद नहीं है. जेपी मॉर्गन के मुताबिक, डॉलर ‘अभी भी पोर्टफोलियो पर हावी है और आने वाले वक्त में ऐसा ही रहेगा.’

एक्सपर्ट्स कहते हैं कि डॉलर का दबदबा धीरे-धीरे कम होगा. डॉलर की हिस्सेदारी 2000 में 71% से घटकर 2026 में 56% आ चुकी है. यह गिरावट जारी रहेगी, लेकिन यह ‘पतन’ नहीं, बल्कि ‘धीरे-धीरे कम होना’ होगा. गोल्डमैन सैक्स का कहना है कि डॉलर का राज आसानी से खत्म नहीं हो सकता है. हालांकि, अगर अमेरिका की नीतियों में अनिश्चितता बढ़ी तो लंबी अवधि के जोखिम जरूर हैं.



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