• January 29, 2026

UGC की नई इक्विटी गाइडलाइन पर सुप्रीम कोर्ट की रोक: क्या बदला, क्यों मचा बवाल और छात्रों पर क्य

UGC की नई इक्विटी गाइडलाइन पर सुप्रीम कोर्ट की रोक: क्या बदला, क्यों मचा बवाल और छात्रों पर क्य
Share

सुप्रीम कोर्ट ने यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन (UGC) द्वारा 23 जनवरी को जारी किए गए ‘उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने’ से जुड़े नियमों पर फिलहाल रोक लगा दी है. कोर्ट का यह कदम उन याचिकाकर्ताओं के लिए राहत लेकर आया है, जिन्होंने इन नियमों को मनमाना, भेदभावपूर्ण और संविधान तथा UGC एक्ट, 1956 के खिलाफ बताया था. अब इन नियमों के अमल पर अस्थायी विराम है और आगे की सुनवाई में कोर्ट तय करेगा कि ये नियम वैध हैं या नहीं.

सुप्रीम कोर्ट ने क्यों लगाई रोक?
इन नियमों के खिलाफ दायर याचिकाओं में कहा गया था कि नई व्यवस्था समानता के सिद्धांत के खिलाफ जाती है और कुछ वर्गों को बाहर कर सकती है. याचिकाकर्ताओं ने यह भी तर्क दिया कि UGC को ऐसे नियम बनाने का अधिकार नहीं है, क्योंकि ये UGC एक्ट, 1956 के प्रावधानों का उल्लंघन करते हैं. सुप्रीम कोर्ट ने इन दलीलों को सुनते हुए फिलहाल नियमों के लागू होने पर रोक लगा दी है.

UGC को नई गाइडलाइन लाने की जरूरत क्यों पड़ी?
संविधान साफ तौर पर कहता है कि जाति, धर्म, लिंग, जन्म स्थान, नस्ल और दिव्यांगता के आधार पर किसी के साथ भेदभाव नहीं होना चाहिए. लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि उच्च शिक्षण संस्थानों में आज भी भेदभाव की शिकायतें सामने आती रहती हैं. कहीं जाति को लेकर ताने, कहीं भाषा और क्षेत्र को लेकर मज़ाक, तो कहीं जेंडर के आधार पर पक्षपात के आरोप लगते रहे हैं. इसी पृष्ठभूमि में UGC ने गजट में “Promotion of Equity in Higher Education Institutions Regulations, 2026” नोटिफाई किया था. इसका मकसद था- शिक्षा संस्थानों में भेदभाव के खिलाफ एक मजबूत और एक जैसा कानून लागू करना.

पहले क्या व्यवस्था थी
नई गाइडलाइन से पहले भेदभाव से जुड़ा सिस्टम बंटा हुआ था. SC/ST छात्रों के लिए अलग एंटी-डिस्क्रिमिनेशन सेल, महिलाओं के लिए अलग शिकायत तंत्र, दिव्यांग छात्रों के लिए अलग नियम थे, लेकिन पूरे कैंपस के लिए कोई ऐसा साझा, सख्त और समय-सीमा में फैसला देने वाला सिस्टम नहीं था. इसका नतीजा यह होता था कि कई शिकायतें दब जाती थीं या सालों तक लटकी रहती थीं.

नई गाइडलाइन में क्या बदलाव किया गया?
UGC की नई गाइडलाइन के तहत हर कॉलेज और यूनिवर्सिटी में दो व्यवस्थाएं अनिवार्य की गई थीं-

1. Equal Opportunity Centre (EOC)
जहां कोई भी छात्र या शिक्षक यह शिकायत कर सकता था कि उसके साथ भेदभाव हुआ है.

2. Equity Committee
जो इन शिकायतों की जांच कर कार्रवाई की सिफारिश करती.

इक्विटी कमेटी में कौन-कौन शामिल

नई व्यवस्था के तहत इक्विटी कमेटी में ये सदस्य तय किए गए थे-

  • कुलपति या प्रिंसिपल (अध्यक्ष)
  • SC प्रतिनिधि
  • ST प्रतिनिधि
  • OBC प्रतिनिधि
  • महिला सदस्य
  • अल्पसंख्यक या दिव्यांग प्रतिनिधि
  • एक सीनियर प्रोफेसर या विशेषज्ञ

यानी फैसला किसी एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि सामूहिक समिति का होना था. इस पूरी प्रक्रिया की निगरानी सीधे UGC करता.

कमेटी की जिम्मेदारियां

इक्विटी कमेटी का काम था-

  • शिकायत दर्ज करना
  • दोनों पक्षों को सुनना
  • सबूत और रिकॉर्ड की जांच करना
  • समय पर रिपोर्ट तैयार करना
  • दोषी पाए जाने पर कार्रवाई की सिफारिश करना

विवाद क्यों खड़ा हुआ?
गाइडलाइन गजट में आते ही सोशल मीडिया पर एक बड़ा सवाल उठने लगा- जब SC, ST, OBC, महिला, अल्पसंख्यक और दिव्यांग के लिए प्रतिनिधि तय किए गए हैं, तो जनरल या सवर्ण वर्ग के लिए अलग प्रतिनिधि क्यों नहीं है?

यहीं से यह बहस तेज हो गई कि क्या सामान्य वर्ग को पहले से ही संदेह के दायरे में खड़ा कर दिया गया है. कुछ लोगों ने सवाल उठाया कि क्या यह मान लिया गया है कि भेदभाव करने वाले वही होंगे. इसी मुद्दे पर सोशल मीडिया पर ट्रेंड चले और कुछ संगठनों ने UGC कार्यालय के बाहर प्रदर्शन भी किए.

आम छात्र पर क्या असर पड़ता?
मान लीजिए दिल्ली की किसी यूनिवर्सिटी में पढ़ने वाला एक सामान्य छात्र है. अगर उसे क्लास में उसकी जाति, भाषा या क्षेत्र को लेकर ताने मिलते हैं, या इंटरनल मार्क्स में पक्षपात महसूस होता है, तो पहले वह डर के कारण चुप रह जाता था. उसे लगता था कि शिकायत करने पर टीचर नाराज़ हो जाएंगे और उसका करियर प्रभावित होगा.

नई व्यवस्था में वह सीधे Equal Opportunity Centre में शिकायत कर सकता था. उसकी पहचान गोपनीय रखी जानी थी, इक्विटी कमेटी जांच करती और कॉलेज प्रशासन को जवाब देना पड़ता.

गाइडलाइन की कमियों पर उठे सवाल
नई गाइडलाइन को लेकर कुछ गंभीर आशंकाएं भी सामने आईं. सबसे बड़ा सवाल यह था कि झूठी शिकायत करने वालों के लिए सजा का प्रावधान साफ तौर पर क्यों नहीं बताया गया. कई लोगों का कहना था कि अगर कोई दुर्भावना से किसी को फंसाए, तो उसके लिए भी स्पष्ट दंड होना चाहिए. इसके अलावा, सजा तय करने की प्रक्रिया में संस्थान प्रमुख और कमेटी को काफी अधिकार दिए गए थे, जिससे दुरुपयोग की आशंका भी जताई गई.

शिक्षा नीति से आगे बढ़कर राजनीतिक बहस
इन्हीं कारणों से यह मुद्दा अब सिर्फ शिक्षा सुधार तक सीमित नहीं रहा. यह राजनीति और जातिगत बहस का रूप ले चुका है- “किसे प्रतिनिधित्व मिला और किसे क्यों नहीं?”

सरकार और UGC का पक्ष
सरकार और UGC का कहना है कि यह कानून किसी जाति के खिलाफ नहीं, बल्कि भेदभाव की सोच के खिलाफ है. उनके मुताबिक यह नियम SC, ST, OBC, जनरल, महिला, पुरुष, नॉर्थ ईस्ट, साउथ, दिव्यांग और अल्पसंख्यक- सभी के लिए है. मकसद सिर्फ एक है- कैंपस में बराबरी और सम्मान का माहौल बनाना.



Source


Share

Related post

‘अब लड़कियां…’, पुणे में होने वाले गूंज कार्यक्रम पर बोले राहुल गांधी

‘अब लड़कियां…’, पुणे में होने वाले गूंज कार्यक्रम…

Share लोकसभा में विपक्ष के नेता और कांग्रेस सांसद राहुल गांधी ने महाराष्ट्र के पुणे में छात्रों की…
Savarkar defamation case: Supreme Court quashes Lucknow Court order summoning Rahul Gandhi

Savarkar defamation case: Supreme Court quashes Lucknow Court…

Share Rahul Gandhi gets relief as SC quashes summons NEW DELHI: The Supreme Court on Friday set aside…
जस्टिस वर्मा का जाना तय! इम्पीचमेंट या इस्तीफा होगा मंजूर? समझें वकीलों की जुबानी

जस्टिस वर्मा का जाना तय! इम्पीचमेंट या इस्तीफा…

Share 14 मार्च 2025 की रात को दिल्ली के तुगलक क्रीसेंट स्थित जस्टिस यशवंत वर्मा के सरकारी बंगले…